भूल जाएं संगीत, देह संगीत, आत्मा का गीत और उस से प्रीति करना भूल जाएं।
3.
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-यह मानवीय स्वभाव है कि वह अपनी जिससे प्रीति करना चाहता है उससे तत्काल ही वैसी आशा करता है।
4.
तथा (अशुचि) मलमूत्र आदि के समुदाय दुर्गन्धरूप मल से परिपूर्ण शरीर में पवित्रबुद्धि का करना, तथा तलाब, बावरी, कुण्ड, नदी आदि में तीर्थ और पाप छुड़ाने की बुद्धि करना और उनका चरणामृत पीना ; एकादशी आदि मिथ्या व्रतों में भूख प्यास आदि दुखों का सहना ; स्पर्श इन्द्रिय के भोग में अत्यन्त प्रीति करना इत्यादि अशुद्ध पदार्थों को शुद्ध मानना और सत्यविद्या, सत्यभाषण, धर्म, सत्संग, परमेश्वर की उपासना, जितेन्द्रियता, सर्वोपकार करना, सब से प्रेमभाव से वर्त्तना आदि आदि शुद्ध व्यवहार और पदार्थों में अपवित्र बुद्धि करना, यह अविद्या का दूसरा भाग है |